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शरदऋतु की पंछीकी तरह,
प्रातःकाल की चाँदीकी तरह,
घायलीदिल की खामोषी है ये।
चुपतेकांटे के दामन है दिल,
पूछतेथके अनुत्तरित प्रश्न है कष्ट,
अप्रत्याशित जंगके मलवा है जीवन|
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